योग उपासना कैसे करें?

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योग उपासना

1.आसन

शुद्धिकरण – ब्रह्म-महूर्त और संध्या में, मैं संभावित विघ्नों से निवृति के पश्चात्, सिद्ध आसन ग्रहण कर के, मैं अपने तीन शरीरों, पाँच कोषों और सात चक्रों को तीन बार आचमन कर के और विश्वानि-देव मंत्र द्वारा शुद्ध करता हूँ।

ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद् भद्रं तन्न आ सुव॥

योग उपासना को शाब्दिक अभिव्यक्ति से रहित, केवल आन्तरिक भावना से करता हूँ

परमात्मा, आप मेरी उपासना को सिद्ध करें

नेत्र बंद कर के, सिर से पाँव तक, मैं अपने समस्त अंगों को शिथिल और तनाव रहित करता हूँ।

लक्ष्य – मेरा लक्ष्य, प्रत्येक जीवन में, मैं क्षण-प्रतिक्षण परमात्मा का ध्यान करता रहूँ, और शीघ्रतम से शीघ्रतम परमात्मा को उपलब्ध हूँ।

उक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिये मैं ईमानदारी, बुद्धिमत्ता और मेहनत से चित्त को एकाग्र करके परमात्मा की उपासना का दृढ़ निश्चय और शुद्ध संकल्प करता हूँ।

आवाहन – मैं परमात्मा की शक्तियों और अभिव्यक्तियों का आदरपूर्वक आवाहन करता हूँ। मैं सब को नमन और सब का अभिनंदन करता हूँ।

शुद्धिकरण और आवाहन के पश्चात्, मैं शरीर को स्थिर करने के लिये, त्रिनेत्र पर ध्यान केंद्रित कर के, ॐ ख़म ब्रह्म मंत्र द्वारा, अनंत का ध्यान करते हुए, सुख पूर्वक आसन लगा कर द्वन्दों को हटाता हूँ।

 

2.प्राणायाम

आसन से शरीर को स्थिर करने के पश्चात, मैं तीन अथवा इक्कीस बार बाह्य-अभ्यन्तर-विषय-आक्षेपी प्राणायाम के द्वारा चित्त को वश में करने, धारणा की योग्यता बढ़ाने के लिए और प्रकाश के आवरण का क्षय करता हूँ।

 

3.प्रत्याहार

मैं प्राणायाम से चित्त को वश में करने के पश्चात्, मैं अपनी इंद्रियों की वृत्तियों अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध से आसक्ति हटा कर, चित्त को आत्मतत्व में लगा कर, स्वयं के शुद्ध चेतन स्वरूप का ध्यान करता हूँ।

 

4.धारणा

प्रत्याहार से चित्त और इंद्रियों की वृत्तियों को वश में करने के पश्चात्, मैं चित्त की एकाग्रता के लिये तालू से ध्यान आरम्भ कर के, ध्यान को त्रिनेत्र पर स्थित करता हूँ। उस के पश्चात् त्रिनेत्र-देश पर अपने चित्त को वृत्ति-मात्र से बांधता हूँ, और त्रिनेत्र-देश पर समान-वृत्ति अर्थात् “स्मृति-रहित प्रत्यक्ष मनोदैहिक विशेष-ज्ञान की संवेदना” का पुन: पुन: उदय और शान्त होने की अनुभूति करता हूँ।

 

5.ध्यान

उस धारणा के परिपक्व और त्रिनेत्र-देश के भान की गौणता होने पर, उक्त अनुभूति के ज्ञान की एकरूपता और अमिश्रित प्रवाह की अनुभूति करता हूँ।

उस के पश्चात्, मैं द्रष्टा भाव से, मैं त्रिनेत्र-देश पर, स्मृति अर्थात् आगम समान्य-ज्ञान से, ॐ के जप के साथ, ॐ के अर्थ की भावना; परमात्मा हमें सतत देख, सुन और जान रहा है, की अनुभूति के साथ परमात्मा की सर्वव्यापकता की पुन: पुन: भावना करता हूँ।

 

6.समाधि

उस ध्यान के परिपक्व होने के पश्चात्, केवल ध्येय का प्रत्यक्ष अर्थात् स्मृति से रहित विशेष-ज्ञान का दर्शन होना, और स्वयं का शून्य जैसे प्रतीत होना समाधि है।

7. प्रार्थना

अप्रत्याहार – समाधि के पश्चात्, मैं चेतना का प्रसव क्रम अर्थात् वापिस चित्त को प्राण में, और प्राण को शरीर में प्रवेश होने का आदेश देता हूँ। मैं परमात्मा की उपस्थिति की अनुभूति को उपासना के अन्त तक बनाये रखूँगा।

क्षमा याचना की प्रार्थना – उपस्थित पूज्य देवी देवता, प्रकृति माँ और परम् पिता परमेश्वर मेरी त्रुटियों के लिए मुझे क्षमा करें, और लक्ष्य प्राप्ति के लिये मेरी सहायता करें।

कल्याणकारी गुण की प्राप्ति की प्रार्थना – लक्ष्य प्राप्ति के लिये कल्याणकारी गुण जैसे सुख, शक्ति, सुसंस्कार, स्वास्थ, स्वावलंबन, दीर्घ आयु, यम-नियम, अभ्यास, विवेक-युक्त वैराग्य, तीव्र संवेग से युक्त श्रद्धा आदि, मैत्री आदि, प्रतिपक्ष भावना, एकाग्र चित्त और निरुद्ध चित्त, विवेकख्याति, उत्थान के अक्लिष्ट संस्कार और समाधि आदि मुझे प्रदान करें।

विघ्नो के नाश की प्रार्थना – लक्ष्य प्राप्ति में विघ्न जैसे अविद्या, व्याधि-विक्षेप आदि, वितर्क आदि, क्षिप्त-मूढ़-विक्षिप्त चित्त, लोभ, क्रोध, मोह और क्लिष्ट संस्कारों आदि का मेरे लिए नाश करें।

आर्शीवाद की प्रार्थना – लक्ष्य प्राप्ति, कल्याणकारी गुणों की प्राप्ति और विघ्नों के नाष के लिये, मैं परमात्मा और सब उपस्थित देवों से उन का आर्शीवाद, सिद्धयाँ और शक्तियाँ को ग्रहण करता हूँ।

ॐ विश्वानि देव मंत्र से प्राप्त शक्ति से शरीर का तीन बार मार्जन कर के शुद्ध करता हूँ।

सर्व कल्याण की प्रार्थना – ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

समर्पण और विसर्जन – मैं सब उपस्थित देवों का धन्यवाद करता हूँ, और सब से आज्ञा लेता हूँ।

मैं उपासना को परमात्मा को समर्पित करता हूँ। हे परमात्मा मुझे समर्पित उपासना का कल्याणकारी फल दीजिये।

ॐ आनन्दम्। ॐ आरोग्यम्॥

ॐ श्री परमात्मने नमः।

 

8. स्वाध्याय

श्रवण –

वेदों और उन के उपवेद, उपनिषद और शास्त्रों का प्रतिदिन श्रवणचतुष्टय अर्थात् श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार करता हूँ।

ऋग्‍वेद का अथर्ववेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गान्‍धर्ववेद, अथर्ववेद का आयुर्वेद, यह चार वेद और उन के चार उपवेद हैं।

ईशावास्योपनिषद, केनोपनिषद्, कठोपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक्योपनिषद्, ऐतरेयोपनिषद्, तैत्तरीयोपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद्, बृहदारण्यकोपनिषद् और छान्दोग्योपनिषद्, यह ग्यारह मुख्य उपनिषद हैं।

सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, उत्तर मीमांसा और पूर्व मीमांसा, यह छ: दर्शन शास्त्र हैं।

योग दर्शन और सांख्य दर्शन, क्रमश: महर्षि पतंजलि और महर्षि कपिल द्वारा प्राणित है योग का भाष्य महर्षि व्यास ने किया योग दर्शन के चार पाद और 195 सूत्र हैं

मनन –

चेतनतत्त्व (अर्थात् परमात्मा और आत्मा) और जड़तत्त्व (अर्थात् प्रकृति) का चिन्तन।

परमात्मा क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से असंबंधित; सर्वज्ञा; सर्वकल्याणकारी; काल से अबाधित परम् गुरु, जो चेतन पुरुषविशेष है, वही ईश्वर है।

देश और काल से परमात्मा का नाम, गुण, कर्म और स्वभाव जैसै ॐ, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली, सर्वरक्षक, सर्वाधिष्ठाता, सर्वनियन्ता, सर्वकर्ता-धर्ता-हर्ता, निराकार, निर्विकार, निसंग, अखण्ड, अनादि-अनन्त, नित्य-कूटस्थ, सत्त्-चित्त्-आनंद और नित्य-अपरिणामी है।

आत्मा – पुरुष अर्थात् आत्मा, चितिशक्ति अर्थात् चेतन; नित्य अपरिणामिनी अर्थात् धर्म, लक्षण और अवस्था के परिणाम से रहित; अप्रतिसंक्रमा अर्थात् जड़ चित्त के मिश्रण से रहित; दर्शितविषया अर्थात् जड़ चित्त का द्रष्टा; शुद्ध अर्थात् अविद्या आदि से रहित; अनन्ता अर्थात् नाश रहित; अल्पज्य और एकदेशीय है

ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न, सुख, दुःख, राग और द्वेष आदि आत्मा की बुद्धि के गुण हैं। सुख, दुःख, राग और द्वेष गुण प्रकृति के निमित्त से हैं। पुरुष अर्थात् आत्मा, अयम् आत्मा ब्रह्म, परमात्मा का सजातीय चेतन-तत्त्व है।

जागृत (अन्नमय कोष, प्राणमय कोष और स्थूल शरीर), स्वप्न (मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और सूक्ष्म शरीर), सुषुप्ति (आन्दमय कोष और कारण शरीर) और तुरीय, यह शरीर में चेतना की तीन अवस्थाएँ हैं।

प्रकृति – परमात्मा की प्रेरणा से, नित्य-परिणामी जड़ प्रकृति, स्वामी पुरुष के लिये भोग और अपवर्ग का प्रयोजन करती है।

सत्त्व अर्थात् सुख, ज्ञान और प्रकाश; रजस इच्छा, चंचलता और क्रिया; और तमस अज्ञान और स्थिति; यह प्रकृति के तीन गुण हैं।

प्रधान अर्थात् प्रकृति के तीन गुणों की सम अवस्था; प्रधान से सत्त्व-प्रधान महत् अथवा बुद्धि; महत् से सत्त्व-प्रधान अहंकार; अहंकार से सत्त्व-प्रधान चित्त; अहंकार से रजस-प्रधान पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ अर्थात् नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा और कर्ण; अहंकार से रजस-प्रधान पाँच कर्मेन्द्रियाँ अर्थात् वाक्, हस्त, पाद, गुदा और उपस्थ; अहंकार से तमस-प्रधान पाँच तन्मात्राएँ अर्थात् शुद्ध गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द; तन्मात्राओँ से तमस-प्रधान पाँच महाभूत अर्थात् पंचीकृत आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी हैं, यह प्रकृति के छब्बीस तत्त्व और उन का प्रसव क्रम है। आत्मा, परमात्मा और प्रकृति, कुल अट्ठाईस तत्त्व हैं।

समष्टि-माया से व्यष्टि-अविद्या; आणव अथवा एकदेशीय होना जो देश, काल, नियति, विद्या और राग से होता है; और कर्त्तत्व-भोगतृत्व, यह शिव सूत्र के अनुसार, महत् से अहंकार तक, शक्ति का संकोचन, इन तीन मलों द्वारा होता हैं।

पांच स्थूलभूत, पांच ज्ञानन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय और मन, यह सोलह विकारों का नाम विशेष; पांच तन्मात्र और अहंकार, यह छ: विकारों का नाम अविशेष; महत् लिङ्गमात्र; और प्रकृति के तीन गुणों की सम अवस्था का नाम अलिङ्ग, यह चारों गुणों की सूक्ष्म से स्थूल होने की अवस्था विशेष होने से गुणपर्व कहलाते हैं

विशेष, अविशेष और लिङ्गमात्र, यह तीन अवस्थायें अनित्य है, जो पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग का प्रयोजन करती है; और चौथी अलिङ्ग अवस्था नित्य और कारण रहित हैइन गुणों की दो अवस्थायें होती हैं, एक सम और दूसरी विषम, प्रलयकाल में सम अवस्था और उत्पत्त्किाल में विशम अवस्था होती है 

पांच स्थूलभूत, पांच ज्ञानन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय और मन, यह सोलह का नाम विकृतयाँ, जो व्यक्त है; और अलिङ्ग, लिङ्गमात्र, अहंकार और पांच तन्मात्र, यह आठ का नाम प्रकृतियाँ, जो अव्यक्त है

युतसिद्धावयव (अर्थात् वन आदि, जो पृथक अव्ययों का समूह) तथा अयुतसिद्धावयव (अर्थात् वृक्ष आदि जो पृथक न होने वाले अव्ययों का समूह), यह दो प्रकार के समूह हैं अयुतसिद्ध अव्यय भेदों में रहने वाले, समान्य और विशेष के समूह को द्रव्य कहते है

शरीर – अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय, यह पाँच कोष हैं। अन्नमय में शीत और तप उर्मी, प्राणमय में भूख और प्यास उर्मी, और मनोमय में लोभ और मोह उर्मी का निवास स्थान है।

स्थूल शरीर में अन्नमय; सूक्ष्म शरीर में प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय; और कारण शरीर में आनंदमय कोष रहता है।

मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्त्रार, यह मेरुदण्ड के आधार से सिर की शिखा तक क्रमश: सात चक्र हैं। मेरुदण्ड में सुषुम्ना, इड़ा और पिंगला नाड़ियां हैं, जो क्रमश: मध्य, बायीं और दाहिनी ओर स्थित हैं। आज्ञा-चक्र में सुषुम्ना, इड़ा और पिंगला नाडियों का संगम होता है, जिसे युक्त-त्रिवेणी कहा जाता है।

स्थूल शरीर को स्वस्थ रखने के लिये तीन, बारह अथवा सताइस बार सूर्य नमस्कार। आठ आसन और उन के विपरीत आसन अर्थात् अर्धसर्वांगासन और मत्स्यासन, हलासन और अर्धचक्रासन, पश्चिमोत्तासन और उष्टासन के पश्चात अर्धमत्स्येन्द्रासन और शवासन आदि।

प्राण – प्राण ऊर्जा 72,000 सूक्ष्म नाड़ियों में संचालित होती हैं। प्राण जो नासिका से ह्रदय तक; अपान प्राण जो नाभि पैरों तक; समान प्राण जो ह्रदय से नाभि तक; उदान प्राण जो कण्ठ से शिर तक; और व्यान प्राण जो पूरे शरीर की नाडिय़ों में रहता है, यह पाँच मुख्य-प्राण हैं।

नाग प्राण जो कण्ठ से मुख तक; कूर्मा प्राण जो मुख के नेत्र गोलक में; कृकला प्राण जो मुख से हृदय तक; देवदत्त प्राण जो नासिका से कण्ठ तक; और धनन्जय प्राण जो सम्पूर्ण शरीर में व्यापक रहता है, यह पाँच उप-प्राण हैं।

कपालभाति, भस्त्रिका और अनुलोम-विलोम आदि, स्थूल प्राणायाम हैं।

पूरक, रेचक, जालंधरबंध, उड्डीयानबंध, मूलबन्ध, ॐ के जप के साथ क्षमता अनुसार, घबराहट होने तक कुम्भक और फिर पूरक करते हुए क्रमश मूलबन्ध, उड्डीयानबंध, जालंधरबंध खोल कर और तीन समान्य श्वास, यह बाह्य-प्राणायाम है।

आज्ञा चक्र पर ओ+अम् प्राणायाम अर्थात् मानसिक स्तर पर त्रिनेत्र से “ओ” के साथ श्वास और “अम्” के साथ प्रश्वास को प्रयत्न रहित हो कर, द्रष्टा भाव से देखना, यह चतुर्थ बाह्य-अभ्यन्तर-विषय-आक्षेपी प्राणायाम है

देश, काल और संख्या द्वारा प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म हो जाता है

चित्त – मन से संकल्प और विकल्प; बुद्धि से निश्‍चयात्मक; चित्त से स्मृति और संस्कार; और अहंकार से अहम् और ममत्व होता है, यह अंतःकरण चतुष्टय हैं।

चित्त के व्यपार से, जो चित्त पर छाप पड़ती, उसे संस्कार कहते हैंवासना रूप संस्कार स्मृति और क्लेश की उत्प्न्न करने वाले; और धर्माधर्म रूप संस्कार कर्मफल अर्थात् जाती, आयु और भोग का फल देने वाले, यह दो प्रकार के संस्कार होते हैं

चित्त की अवस्थायें चित्त की सत्त्व, रजस और तमस वृत्तियों का रूप ऐश्वर्य और अनैश्वर्य, धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञान, वैराग्य और अवैराग्य है

क्षिप्त जो रजस-प्रधान अर्थात् ऐश्वर्य और विषय की इच्छा; मूढ़ जो तमस-प्रधान अर्थात् अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य में मग्न; विक्षिप्त जो सत्त्व-प्रधान + रजस अर्थात् धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य अभिमुख; एकाग्र जो सत्त्व-प्रधान अर्थात् विवेकख्याति को प्राप्त; और निरुद्ध में संस्कार-मात्र शेष से आत्मा का साक्षात्कार के पश्चात पर-वैराग्य के द्वारा असम्प्रज्ञात समाधि (अर्थात् चित्त के समस्त वृत्तियों का रुकना और मोक्ष जैसा अनुभव होना) प्राप्त होती है; यह चित्त की पाँच अवस्थाएँ है। एकाग्र और निरुद्ध अवस्था केवल योगियोँ को अभ्यास और वैराग्य द्वारा प्राप्त होती हैं।

चित्त की वृत्तियाँ – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति, यह चित्त की पाँच प्रकार क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियाँ हैं, जो चित्त के परिद्रष्ट धर्म हैं। चित्त की क्लिष्ट वृत्तियाँ, क्लेशों को उत्प्नन करती हैं। प्रमाण वृत्ति, शेष वृत्तियों अर्थात् विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति का आधार है। वृत्ति, स्मृति और संस्कार चक्र अनादि है।

प्रमाण में प्रत्यक्ष-प्रमाण जैसे रस्सी में रस्सी का ज्ञान; अनुमान-प्रमाण में कार्य-कारण के संबन्ध से ज्ञान; और आगम-प्रमाण अर्थात् आप्त-पुरुष के वचन से यथार्थ ज्ञान जैसे शास्त्र, यह तीन प्रकार के प्रमाण हैं। प्रत्यक्ष में विशेष-ज्ञान प्रमुख और समान्य-ज्ञान गौण होता है।

अनुमान अर्थात् पूर्ववत-अनुमान में कार्य को देख कर कारण का ज्ञान जैसे अग्नि से धूम की उत्पत्ति का अनुमान; शेषवत-अनुमान में कारण को देख कर कार्य का ज्ञान जैसे धूम को देखकर अग्नि का अनुमान; और समान्यदृष्ट-अनुमान में कार्य और कारण श्रृंखला का ज्ञान जैसे नदी के ऊफान से वर्षा, और वर्षा से बादलों का ज्ञान होना, यह तीन प्रकार के अनुमान हैं। अनुमान में समान्य-ज्ञान प्रमुख, और विशेष-ज्ञान गौण होता है।

विपर्यय अर्थात् मिथ्या ज्ञान, जिसमे कुछ अंश सत्य का भी होता है, जैसे रस्सी में साँप का भ्र्म; विकल्प अर्थात् वस्तु-शून्य शब्द जैसे अग्नि की गर्मी; निद्रा अर्थात् ज्ञान के आभाव की प्रतीति के साथ सुख, दुःख: अथवा मूढ़ निन्द्रा की प्रतीति; और स्मृति अर्थात् अनुभव में आए हुए विषयों का न भूलना है। भावित स्मर्तव्य स्मृति जो स्मृति की काल्पनिक स्मृति जैसे स्वप्न काल; और अभावित स्मर्तव्य स्मृति जो जाग्रत काल में होती हैं, यह दो प्रकार की स्मृति है।

प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति से स्मृति का निर्माण होता है। प्रत्यक्ष वृत्ति शेष वृत्तियों अर्थात् अनुमान, आगम, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति वृत्तियों का आधार है।

सत्त्व-प्रधान चित्त, जड़ प्रकृति से निर्मित है। चित्त की ज्ञान की वृत्तियाँ अर्थात् चित्त का परिदृष्ट धर्म, इच्छा और प्रयत्न के बिना किसी अनवांछित विषय में स्वयं नही लग सकता। चित्त की आगन्तुक चंचलता से, चित्त की प्राकृतिक स्थिरता बलवान होती है

निरोध, धर्म, संस्कार, परिणाम, जीवन, चेष्टा और शक्ति, यह चित्त के अपरिद्रष्ट धर्म हैं, जो अनुमान से जाने जाते हैं

ज्ञान ज्ञानन्द्रियों द्वारा, भाव हृदय द्वारा और चेष्टा कर्मेन्द्रियों द्वारा, यह जाग्रत अवस्था में चित्त के व्यापार हैं

परिणाम – प्रकृति में आधार रूप धर्मी में गुणों के कार्य-कारण संबन्ध से धर्म से लक्षण परिणाम, लक्षण से अवस्था परिणाम, जो चित का अभिभव अर्थात् संस्कारो का वर्तमान से भूत में दबना, और प्रादुर्भाव अर्थात् संस्कारो का अनागत से वर्तमान में प्रकट होना, जो भूत और इन्द्रियों में होता है, यह परिणाम हैं।

पूर्व धर्म की निवृत्ति और नये धर्म की प्राप्ति की संभावना, यह धर्म-परिणाम है।

अनागत-लक्षण-परिणाम में धर्म का वर्तमान में प्रकट होने से पहले भविष्य में छिपा रहना; वर्तमान-लक्षण-परिणाम में धर्म का भविष्य को छोड़ कर वर्तमान में प्रकट होना; और अतीत-लक्षण-परिणाम में धर्म का वर्तमान को छोड़ कर भूतकाल में छिप जाना, यह लक्षण-परिणाम है।

अनागत-लक्षण-परिणाम से वर्तमान-लक्षण-परिणाम में धर्म का प्रतिक्षण दृढ होना; और वर्तमान-लक्षण-परिणाम से अतीत-लक्षण-परिणाम में धर्म का प्रतिक्षण दुर्बल होना, यह अवस्था-परिणाम है।

समाधि – अभ्यास और विवेक-युक्त वैराग्य से चित्त में एकाग्रता-परिणाम, समाधिपरिणाम और निरोध-परिणाम, यह चित्त के तीन प्रकार के परिणाम हैं।

व्युत्थान (अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि) का अभिभव और निरोध संस्कारों का प्रादुर्भाव होना, निरोध-परिणाम हैसर्वार्थता का अभिभव और एकाग्रता का प्रादुर्भाव होना, समाधिपरिणाम है। एक ही ध्येय विषय की पुन: पुन: समान वृत्ति प्रादुर्भाव और अभिभव होना, एकाग्रता-परिणाम है।

एकाग्र-परिणाम से सम्प्रज्ञात समाधि और निरुद्ध-परिणाम से असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है। सम्प्रज्ञात अथवा सबीज़ समाधि से आत्म-दर्शन, और असम्प्रज्ञात समाधि अथवा निर्बीज समाधि से परमात्मा का दर्शन होता है।

एकाग्र चित्त अर्थात् सम्प्रज्ञात समाधि से वस्तु का यथार्थ ज्ञान, क्लेशों को क्षीण, कर्म बन्धनों को शिथिल और निरोध अभिमुख करती है। एकाग्र चित्त से विवेकख्याति अर्थात् पुरुष और चित्त की भिन्नता का ज्ञान प्राप्त होता है। धर्ममेघ समाधि में स्थायी विवेकख्याति होती है

सम्प्रज्ञात अथवा सबीज समाधि के अन्तर्गत वितर्क (अर्थात् सवितर्क और निर्वितर्क), विचार (अर्थात् सविचार और निर्वितर्क), आनन्द और अस्मिता, यह छ: प्रकार की समाधियाँ हैं।

वितर्क समाधि से पाँच भूतों का साक्षत्कार; विचार समाधि से पाँच तन्मात्राओं का साक्षत्कार; आनन्द समाधि से सोहला तत्त्वों का साक्षत्कार; और अस्मिता समाधि से आत्मा का साक्षत्कार होता है।

वितर्क समाधि में सवितर्क अर्थात् स्थूल विषय में शब्द-अर्थ-ज्ञान के विकल्प से सहित; और निर्वितर्क समाधि अर्थात् स्मृति शुद्ध होने से सूक्ष्म विषय में शब्द-अर्थ-ज्ञान के विकल्प से रहित, केवल अर्थमात्र भासना और स्वरूप शून्य जैसा होता है।

विचार समाधि में सविचार अर्थात् विचार का देश, काल और निमित्त अर्थात् धर्मी के विकल्प सहित; और निर्विचार समाधि अर्थात् स्मृति शुद्ध होने से विचार में देश, काल और ज्ञान के विकल्प रहित होता है।

निर्विचार समाधि से सत्य को धारण करने वाली और व्युत्थान के संस्कारो को रोकने वाली ऋतम्भरा-प्रज्ञा की प्राप्ति होती है। पर-वैराग्य से संस्कारों के निरोध होने पर असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त होती है। असम्प्रज्ञात समाधि के पश्चात कैवल्य में, चित्त अपने कारण में लीन हो जाता है

समाधि में ध्याता, ध्यान और ध्येय की त्रिपुटी का लय हो जाता है। धारणा, ध्यान और समाधि की प्रक्रिया को संयम कहते है। संयम से प्राप्त सिद्दियों से राग और अभिमान करने से योग में बाधा होती है संयम को प्रतिदिन चौबीस मिनट से ले कर दो घण्टे और चालीस मिनट तक करना चाहिये।

कर्माशय – शुक्ल कर्म अर्थात् शास्त्र-विहित अथवा अच्छे लक्ष्य के लिए किये गये पुण्य कर्म; कृष्ण कर्म अर्थात् पाप कर्म; शुक्ल-कृष्ण कर्म अर्थात् पाप और पुण्य मिश्रित कर्म; और अशुक्ल-अकृष्ण नपुंसक कर्म हैं, इन सब कर्मों से कर्माशय बनता है। अशुक्ल-अकृष्ण कर्म केवल योगियों के होते हैं। मनुष्य कर्म करने में तो स्वतंत्र है, परन्तु फल भोगने में परतंत्र है।

कर्माशय परिपक्व होने पर, प्रमुख वासना के अनुसार जन्म-मृत्यु चक्र प्रदान करता है, जो दुःखरुपी है।

इन वासनाओं का हेतु अविद्या है; आश्रय अधिकार-सहित चित्त है; और आलंबन इन्द्रियोँ के विषय हैं।

दृष्टजन्मवेदनीयः कर्म इसी जन्म में आयु अथवा भोग, अथवा दोनों आयु और भोग फल देने वालें होते हैं; अदृष्टजन्मवेदनीयः कर्म अगले किसी जन्म में जाती, आयु और भोग फल देने वालें होते हैं, वो नियत-विपाक और अनियत-विपाक हैं।

जिन कर्मों का फल अति शीघ्र प्राप्त होता है, उन को सोपक्रम; और जिन कर्मों का फल विलम्ब से प्राप्त होता है, उन को निरूपक्रम कहते हैं।

तीव्र संवेग से किये गये पुण्य कर्म जैसे मँत्र, तप और समाधि का अधिष्ठान, ईश्वर, देवता और महाऋषि की आराधना का दृष्टजन्म में फल प्राप्त होता है अविद्या आदि क्लेशों से युक्त गये पाप कर्म जैसे डरे हुऐ, रुग्ण, दयनीय, विश्वाश को प्राप्त और तपस्वियों के प्रति हानि का, दृष्टजन्म में फल प्राप्त होता है

संचित अर्थात् असंख्य जन्मों में किए हुऐ कर्म; प्रारब्ध या भाग्य अर्थात् संचित का एक अंश, जो भोगा जा रहा है, वह मंद, मध्यम अथवा तीव्र हो सकता है; क्रियमाण अर्थात् वर्तमान में किया जाने वाले कर्म, यह तीन प्रकार कर्माशय के भाग हैं।

अविद्या – मूल हेतु अविद्या पाँच क्लेशों की उत्पत्ति करती है, जो अविद्या अर्थात् अनित्य में नित्य, अशुचि में शुचि, दुःख में सुख और अनात्म में आत्म का भाव; अस्मिता जो बीज-रूप अहंकार है, उससे दृग् और दर्शन शक्तियों की अविवेकपूर्ण एकात्मता; राग अर्थात् सुख की वासना से उत्पन्न तृष्णा अथवा आसक्ति; द्वेष अर्थात् दुःख की प्राप्ति की निन्दा और क्रोध द्वारा विरोध; और अभिनिवेश अर्थात् शरीर की मृत्यु का भय हैं। अविद्या से अस्मिता, अस्मिता से राग, राग से द्वेष, द्वेष से अभिनिवेश की उत्तपत्ति होती है। अविद्या के ना होने से कर्माशय का विपाक नही हो सकता।

प्रसुप्त क्लेश अर्थात् सुप्त अवस्था; तनु क्लेश अर्थात् समाधि से निर्बल कर दिये गए; विच्छिन्न अर्थात् वर्तमान में दबे हुऐ; उदार क्लेश अर्थात् जो वर्तमान में फल प्रदान कर रहें हैं; दग्ध-बीज़ क्लेश अर्थात् अंकुरित होने की शक्ति को समाधि द्वारा नष्ट कर दिये गए हैं, यह क्लेशों की पाँच अवस्थाऐं हैं।

दु:ख – यह शरीर और विषय छ: षड्विकारों अर्थात् अस्ति अर्थात् अस्तित्व, जायते अर्थात् उत्पन्न होना, वर्धते अर्थात् बढ़ना, विपरिणमते अर्थात् विकार, अपक्षीयते अर्थात् वृद्धावस्था और विनश्यतीति अर्थात् विनाश से युक्त हैं।

परिणाम-दु:ख अर्थात् भोग के पश्चात इच्छा का शांत न होना; ताप-दु:ख अर्थात् सुख की अपूर्णता और सुख प्राप्ति में विघ्नों का दु:ख; संस्कार-दु:ख अर्थात् वस्तु का सुख लेने के पश्चात सुख का न मिलना; और सत्त्व (अर्थात् सुख वृत्ति), रज (अर्थात् दुःख वृत्ति) और तम (अर्थात् मूढ़ वृत्ति) गुणों की वृत्तियों के प्रस्पर विरोधी भाव दोषों से युक्त हैं।

प्रकृति द्वारा निर्मित शरीर, सांस्कारिक सम्बन्ध और सांस्कारिक सुख क्षणिक, दुःख-मिश्रित है, और निश्चित ही त्यागने (अर्थात् अनासक्ति, जो आसक्ति और विरक्ति का मध्य) के योग्य है।

दुःख हेय है; द्रष्टृ और दृष्य का अविवेकपूर्ण संयोग हेयहेतु है; अविवेकपूर्ण संयोग अर्थात् अदर्शन का आभाव हान है; परिपक्व-विवेकख्याति अर्थात् धर्ममेघ समाधि में चेतन-पुरुष और जड़-चित्त का भेद होने का विवेक, हानोपाय है।

स्वाध्याय अर्थात् निदिध्यासन का विश्लेषण भूतकाल की दिनचर्या में कल्याणकारी गुणों और विघ्नो को काल, वेग और अंतराल की कसौटी पर समीक्षा करने के पश्चात, सुधार करने का प्रयत्न्न करता हूँ। ईश्वर अयुक्त भोग में भय, शंका और लज्जा आदि मनोभाव उत्तप्न कर के स्वतंत्रपुरुष को प्रेरित करता है

कल्याणकारी गुण – यम-नियम, यत्नपूर्वक अभ्यास, विवेक-युक्त वैराग्य, तीव्र संवेग से युक्त श्रद्धा आदि, मैत्री आदि, प्रतिपक्ष भावना, एकाग्र चित्त और निरुद्ध चित्त, विवेकख्याति, उत्थान के अक्लिष्ट संस्कार और समाधि आदि का निदिध्यासन और साक्षात्कार करना।

यम (अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (अर्थात् शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान), आसन (अर्थात् शरीर की स्थिर व सुखपूर्ण अवस्था), प्राणायाम (अर्थात् श्वास व प्रश्वास की गति पर नियंत्रण), प्रत्याहार (अर्थात् इन्द्रियों पर नियंत्रण), धारणा (अर्थात् चित्त की स्थिरता), ध्यान (अर्थात् चित्त की एकाग्रता) और समाधि (अर्थात् कैवल्य अथवा मुक्ति की अवस्था), इन सब से अशुद्धि का नाश और विवेकख्याति होती है। यम और नियम का पालन मन, वचन व कर्म से करना चाहिये; और जाती, देश, काल और नियम से अन्विच्छन्न होना चाहिये

अहिंसा (अर्थात् किसी भी प्राणी को अन्यायपूर्वक पीड़ा न पहुँचाना), सत्य (अर्थात् विषय में जैसा देखा, अनुमान व सुना हो, उसे वैसा ही कह देना; न ठगने वाला; न भ्राँति पैदा करने वाला; अभिप्राय व्यक्त में असमर्थ हो; और प्राणी का उपकार करने वाला), अस्तेय (अर्थात् शास्त्रों के विरुद्ध दूसरों के पदार्थ को स्वीकार न करना और न ही उस की इच्छा करना), ब्रह्मचर्य (अर्थात् मोक्षकारक शास्त्रों का अध्ययन व गुप्तेन्द्रियों का संयम) और अपरिग्रह (अर्थात् भोग्य पदार्थों में अर्जनरक्षण आदि दोषों को समझ कर, भोग्य पदार्थों का संग्रह न करना), यह पाँच यम हैं।

अहिंसा के सिद्ध होने पर, योगी के निकट वालों का आपस में वैरभाव समाप्त हो जाता है। सत्य के सिद्ध होने पर योगी के कहे हुए वचनों के फल का प्रभाव दूसरों के ऊपर भी पड़ता है। अस्तेय के सिद्ध होने पर योगी को सभी प्रकार के उत्तम से उत्तम रत्न अर्थात पदार्थ प्रकट होते हैं। ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने पर योगी को अनन्त शारीरिक, मानसिक और बौद्विक बल की प्राप्ति होती है। अपरिग्रह के सिद्ध होने पर योगी को जन्म से सम्बंधित धटनाओं की जानकारी हो जाती है।

शौच (अर्थात् बाह्य शरीर को मट्टी और जल से शुद्ध; पवित्र सात्विक खाना खाना; और आभ्यन्तर चित्त के मल को क्रिया योग से शुद्ध करना), सन्तोष (अर्थात् जीवन निर्वाह के साधनों से अघिक साधनों की इच्छा का आभाव), तप: (अर्थात् भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी के द्वंद्वों को सहना; मौन; और व्रत्त रखना), स्वाध्याय (अर्थात् मोक्षकारक शास्त्रों का अध्ययन; और प्रणव का जप करना) और ईश्वर प्रणिधान, यह पाँच नियम हैं।

प्रणव और ईश्वर का नित्य वाच्य-वाचक संबन्ध है। उस प्रणव के जप के साथ, ईश्वर के शास्त्रीय अर्थ से भावना; ईश्वर की भक्ति विशेष अर्थात् ईश्वर की आज्ञा (अर्थात् शास्त्र आदि) का पालन करना; स्वध्याय से समाधि और समाधि से स्वध्याय की पुष्टि करना; आसन, शय्या और मार्ग पर समस्त कर्मों, और उन कर्मों के फल अर्थात् विषय सुख की इच्छा को ईश्वर को समर्पित करना; और परमात्मा की सतत्त अनुभूति करते रहना, यह ईश्वर-प्राणिधान है।

शौच के सिद्ध होने पर योगी को अपने शरीर के अंगों से घृणा, दूसरों के शरीर से सम्बन्ध बनाने की इच्छा समाप्त हो जाती है। शौच के पालन से बुद्धि की शुद्धि, बुद्धि की शुद्धि से मन प्रसन्न, प्रसन्न मन से एकाग्रता, एकाग्रता से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण और पूर्ण नियंत्रण से आत्मसाक्षात्कार करने की योग्यता प्राप्त होती है। सन्तोष के सिद्ध होने पर योगी को सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है। तप: के सिद्ध होने पर योगी की अशुद्धि का सर्वथा नाश और अशुद्धि के नाश से शरीर व इन्द्रियों की सिद्धि प्राप्त होती है। स्वाध्याय के सिद्ध होने पर योगी को अपने इष्ट देव का साक्षात्कार हो जाता है।

ईश्वर प्रणिधान के सिद्ध होने पर निर्मल चित्त की प्राप्ति; एकाग्रता की प्राप्ति; हिंसा आदि वितर्कों का नाश; संसार-बीज अविद्या का नाश; और व्याधि आदि विघ्नों का अभाव होता है। फल स्वरूप योगी अत्यंत शीघ्रता से, समाधि और समाधि का फल अर्थात कैवल्य को प्राप्त होता है। तीव्र संवेग से किये गये अधिष्ठान जैसे मँत्र और समाधि और ईश्वर की आराधना का, दृष्ट-जन्म में फल प्राप्त होता है। योगी स्वयं अपने में स्थित हो कर, अपने स्वरूप का दर्शन करता है, और अपने को नित्य-मुक्त, आनन्द युक्त, शुद्ध, प्रसन्न, केवल, निर्विकार और बुद्धि के ज्ञान का बौद्ध करने वाला, ऐसा अनुभव करता है। तत्तपश्चात, प्रणव के गौण हो जाने पर, ईश्वर के भाव में योगी असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्मा का साक्षत्कार करता है।

विषयों में अर्जनरक्षण आदि दोष देखकर विषय भोग की द्रष्टि से उनका संग्रह न करना, यह अपरिग्रह है।

यत्न पूर्वक अभ्यास को निरन्तर, दीर्घ काल तक और सत्कार पूर्वक अर्थात् तप, ब्रह्मचर्य, विद्या और श्रद्धा पूर्वक करना चाहिये।

भोगे हुए विषय जैसे अन्न-पान, पुरुष-स्त्री और ऐश्वर्या (अर्थात् पुत्रेष्णा, वित्तेषणा और लोकेषणा) की तृष्णा; और न भोगे हुए दृष्ट विषय जैसे स्वर्ग, प्रकृतिलय और विदेह अवस्था को प्राप्त करने की तृष्णा; के विषय-दोषों को ज्ञान-पूर्वक जान कर, राग-द्वेष रहित तृष्णा न रखकर वशीकार करना, यह वैराग्य है।

यतमान-वैराग्य में प्रयत्न से इन्द्रियों को विषयों में प्रवृत न होने देना; व्यतिरेक-वैराग्य में इन्द्रियों का कुछ विषयों से हट जाना; एकेन्द्रिय-वैराग्य में सब इन्द्रियों का विषयों से हट जाना, परन्तु मन में विषयों की तृष्णा (अर्थात् ईच्छा + भ्रम) का बना रहना; और वशीकार-वैराग्य में चित्त और इन्द्रियाँ पर सम्पूर्ण वश में होना, यह वैराग्य की क्रमश: चार अवस्थायें हैं।

अपर-वैराग्य (अर्थात् देखे और सुने हुए विषयों के प्रति वैराग्य) सम्प्रज्ञात समाधि का उपाय; और पर-वैराग्य (अर्थात् प्रकृति के गुणों को प्राप्त करने की लालसा से रहित) असम्प्रज्ञात समाधि का उपाय है, यह वैराग्य के दो प्रकार हैं।

योग के प्रति श्रद्धा (अर्थात् सत्य को धारण करने वाली अभिरुचि), श्रद्धा से वीर्य (अर्थात् उत्साह), वीर्य से स्मृति, स्मृति से समाधि और समाधि से प्रज्ञा (अर्थात् विवेकख्याति), यह पाँच उपाय-प्रत्यय प्रकिर्या हैं।

उपासना के लिये चित्त को प्रसन्न रखने के लिये सुखी में मैत्री का भाव, दु:खी में करुणा का भाव, पुण्य करने वालों में मुदित का भाव और अपुण्य करने वालों में उपेक्षा (भावन रहित) रखना, यह मैत्री आदि उपाय हैं।

यम और नियम के विरोधी वितर्कों (अर्थात् कृत, कारित और अनुमोदित) का विरोधी भाव अर्थात् गुणों के लाभ और दुर्गुणों की हानि को जान कर, दुर्गुणों के विपरीत सद्‍गुणों को स्थापित करना, यह प्रतिपक्ष भावना है।

विघ्न – अविद्या, व्याधि-विक्षेप आदि, हिंसा आदि वितर्क अर्थात् यम आदि के विरोधी भाव, क्षिप्त-मूढ़-विक्षिप्त चित्त, लोभ, क्रोध और मोह और क्लिष्ट संस्कार आदि।

व्याधि अर्थात् रोग (धातु अर्थात् वात, पित्त और कफ; रस अर्थात् रस से रक्त्त, रक्त्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा, मज्जा से शुक्र और शुक्र से ओज; करण अर्थात् इंद्रियों की विषमता), स्त्यान अर्थात् चित्त की अकर्मण्यता, संशय अर्थात् सन्देह, प्रमाद अर्थात् लापरवाही, आलस्य अर्थात् सुस्त स्वभाव, अविरित अर्थात् विषयों में राग, भ्रान्तिदर्शन अर्थात् विपरीत ज्ञान, अलब्धभूमिकत्व अर्थात् समाधि की प्राप्ति न होना, और अनवस्थितत्व अर्थात् समाधि को स्थिर न रख पाना, यह नौ व्याधियाँ हैं।

दुःख, दौर्मनस्य अर्थात् इच्छापूर्ति न होने से उत्पन्न क्षोभ, अङ्गमेजयत्व अर्थात् अंगों में कम्पन होना, श्वास अर्थात् इच्छा के विरुद्ध श्वास का अपने आप अन्दर आ जाना, और प्रश्वास अर्थात् इच्छा के विरुद्ध श्वास का अपने आप बाहर निकल जाना, यह चार विक्षेप हैं, जो नौ व्याधियाँ के साथ होतें हैं।

ॐ तत्सत् ! ईश्वरार्पणमस्तु !!

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